मन दर्पण _ Perception
मेरे विचारों का वह मधुर, निर्मल या खुंखार प्रतिरूप,
उसे संवारा, सँजोया,या बोया मैंने रखा सदा अनूप।
दिन गुजरे, बदला समय, बदले सब रंग,
तुम भी बदल चले नए किसी रूप के संग।
पर मैं था अटका उसी तुम्हारे चित्र में,
दर्पणके मेरे मन के बंधन की उस लिपि में।
सच में यदि बदलते हूए तुम्हें समझना है,
उस दर्पणके छवि को पहले मिटाना है।
बदलना, मरोडना, मारना या उच्छेदना है |
सवंरना, उभरना, गरीमामय उन्नत बनाना है
अपने ही अंतर्मन का दर्पण करे चिंतन |
न समझ सके उस मायावी छवि का विवरण |
प्रशांत पेडणेकर
२ ऑक्टोबर २०२५
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